Sunday, October 25, 2009

साफ सुथरी जिन्दगी की सड़क हो जो

जब बेटी माँ से अपना कद नापे ,
क्यों न वो शाख सी ख़ुद झुक जाए ,
कैसे बढे हौसला बेटी का
कैसे टूटे तारा किसी निराशा का
माँ तो माँ है माँ ही जाने
क़दम -क़दम पर हाथ बढाए
जब बेटी को चोट जो आए ,
माँ ही मन पे जख्म वो पाये
माँ तो माँ है माँ ही जाने
कैसे दिखाए उसे वो रास्ता ,
जो कोई दलदल न हो ,
होता हो गर तो ,
जिन्दगी की एक साफ सुथरी सड़क होती हो!!!!!!!!!!!!!!

4 comments:

रश्मि प्रभा... said...

maa ki mahima.....akhand,atut,nirmal......

ललित शर्मा said...

आप का स्वागत हैं,
http://lalitdotcom.blogspot.com

Devendra said...

जब बेटी माँ से अपना कद नापे
क्यों न वो शाख सी खुद झुक जाए
बढ़े हौसला बेटी का.....
--इतनी सच्चे इतने अच्छे भाव माँ के ह्रदय से ही निकल सकते हैं..
कवि क्या जाने !
माँ तो माँ है माँ ही जाने!!!

manu said...

जब बेटी माँ से अपना कद नापे ,
क्यों न वो शाख सी ख़ुद झुक जाए ,
कैसे बढे हौसला बेटी का
कैसे टूटे तारा किसी निराशा का
माँ तो माँ है माँ ही जाने

पहली दो लाइन मन को बहुत बहुत छू गयी
बहुत ज्यादा ...

हमें याद है..
हमने सबसे पहले आपका ब्लॉग फालो किया था ..
क्यूंकि ये ब्लॉग माँ का बेटी के नाम पर था..