Wednesday, March 31, 2010

उसकी (पाखी की ) सलामती के लिए

आज फिर तबियत खिली सी है ,
आज फिर वो हस के मचली सी है ,
उसके हसने सो जो झरते हैं फूल ,
लम्हा -लम्हा सजाती हूँ उनको ,
दरो -दीवार पर ,
कहीं उसकी खिलखिलाहट
चुप न हो जाए ,
इसी डर से काजल का टीका लगाती हूँ ,
जो उसे दीखता नहीं कहीं ,
वो नहीं मानती इन बातों को ,
कभी हम ने भी तो नहीं माना था ,
पर एक माँ मानती है दुनिया की
सभी रूढ़ियों को
उसकी(पाखी ) सलामती के लिए ..............

Monday, February 15, 2010

जब पाखी पहली बार अपना tiffin घर में भूल गयी

पाखी छोटी थी ,बहुत छोटी ,एक माँ के लिए तो उनके बच्चे कब बड़े होते हैं ? तो पाखी कितनी बड़ी थी ????,बस इतनी बड़ी की पारंपरिक रूप से स्कूल जाना और नियमबद्ध होकर औपचारिक तरीके से स्कूल के तौर -तरीकों को सीखना शुरू कर ही रही थी , एक दिन जल्दी -जल्दी में उनका tiffin घर में रह गया ,हमे पता लगा जब वो जा चुकी थी , अब हम क्या करते ???????
स्कूल में नियम की पाबंदी की कुछ भी भेजने पर नहीं लिया जाएगा ,सारा दिन इस उथल -पुथल में गुजरा कि पाखी
भूखी होगी ,एक माँ सबसे ज्यादा तब तडपती जब उसके बच्चे भूखे होते हैं ,किसी काम में न मन लगना था और न ही
लगा .समय था कि बीतने का नाम ही नहीं ले रहा था ,कभी कभी आदमी कितना विवश हो जाता है ,किसी तरह वक्त गुजरा और पाखी मैडम हमारी बाहों में ,हम नम आँखों से उसे देखते ।
पाखी आज tiffin तो घर में ही रह गया था फिर .................तो क्या हुआ मम्मी तुम तो बेकार में परेशान हो जाती हो ....
तुमने क्या किया ????????
कुछ खाया ??????????
हाँ
कैसे
simple
हमने अपने एक फ्रेंड से कह दिया कि वो मैम को बता दे कि हम आज tiffin नहीं लाये हैं ,
फिर
मैडम ने सारे बच्चों से कहा कि पाखी को पूरी क्लास अपना खाना शेयर कराएगी मम्मी हमारा पेट तो रोज से ज्यादा ही भर गया ,तुम बेकार में इतना परेशान होती है ,मात्र साढे चार साल की लड़की का पहला सामंजस्य उसके
अपने समाज के साथ ............
अद्भुत था ...............

पाखी तब से ही शायद बड़ी और समझदार होने लगी थी .आजके लिए इतना ही

Friday, December 25, 2009

पाखी और उनका क्रिसमस

बचपन से ही कुछ चरित्र हमेशा प्रभावित करते रहे हैं ,उनमे से सेंटा -क्लॉस भी एक प्रमुख चरित्र रहा है दूसरों को खुशी देने वाला किरदार ,एक अलग जिंदादिल इंसान ,हसमुख इंसान हमेशा दूसरों को कुछ देने वाला .अबचेतन मन में वो सब आप के अन्दर ही छुपा होता है ,और मौके -बेमौके आपके बाहर आता रहता है ,पाखी ने भी जब सेंटा को जाना तब हमने उनका परिचय अलग ढंग से करवाया ,बेटा पाखी वो सेंटा का फ़ोन आया था ,पूछ रहा था कि आपको क्या गिफ्ट चाहिए ,पाखी अपने गिफ्ट्स की लिस्ट हमे बताने लगती ,हम उन्हें समझाते ,बेटा आपके सेंटा को कई जगह जाना होता है ,और बहुत सारे बच्चों को गिफ्ट देने होते हैं ,फिर उनके पास इतने पैसे होते हैं ,कि वो सिर्फ एक ही toy एक बच्चे को दे सकते हैं ,इसलिए जो आपको सबसे पहले चाहिए वो खिलौना आप हमे बता दीजिये ,पाखी के मासूम सवाल मम्मी सेंटा हमसे कभी बात क्यूँ नहीं करता ,हमे उससे बात करनी है ,खुद उसे बताना है कि हमे क्या चाहिए हम उनसे कहते नहीं वो आप से अगली बार बात कर लेगा ,पाखी को अपना मनपसंद खिलौना अपनी तकिया के नीचे मिलता ,एक बार दादी के घर पर मम्मी सेंटा को कैसे पता चलेगा कि हम दिल्ली में नहीं हैं ?इस बार हमे सेंटा गिफ्ट कैसे देगा ?आप हमे बता दो हम उन्हें बता देंगे कि इस बार आप दिल्ली में नहीं होगी हम उनका फ़ोन आने पर उन्हें बता देंगे ,और अपना गिफ्ट भी ,बार्बी डॉल की फ़रमाइश पाखी ने रखी इस बार शायद सेंटा का पूरा इम्तिहान लेना था उन्हें ,हम और उनके चाचू रात में छिप के बाजार जाते और उनकी डॉल लाते ,सुबह अचंभित होती हुई ,मम्मी यहाँ का सेंटा तो और भी अच्छा है ,हमे बार्बी देता है ,अगली बार से हम क्रिसमस पर यहीं होंगे ,दादी -बाबा के घर पर .यकीं मानिए इसमें घर के हर सदस्य को उतना ही मजा आता जैसे वो खुद भी एक बच्चे हो गए हो साल गुजरते रहे ,अब पाखी का क्लास में बच्चों से झगडा होने लगा मम्मी ,"शिवानी कह रही थी कि कोई सेंटा -ventaa नहीं होता है ,तेरे मम्मी पापा रखते होंगे वो खिलौना तेरे लिए हमने उनसे कह दिया नहीं जी हमारे घर तो सेंटा ही आता है ,मेरी मम्मी हमसे झूठ नहीं बोलती कभी भी .पाखी समझदार होने लगी है ,या अपना बचपन खोने लगी है ,पाखी को इस बार भी उनका पसंदीदा गिफ्ट मिल गया ,एक दिन पाखी ने कहा की मम्मी वो arrow वाला गेम एक बच्चे के पास है उसके पापा ने तो दुकान से खरीदा है वो 200rs का मिला था मम्मी क्या .........उसके कुछ बोलने के पहले हमने कहा नहीं बेटा वो तो शायद तुम्हारे पापा और बाबा 140rs का ही लाये थे अब पाखी कि आँखे फटी रह गयीं और हम समझ नहीं पाए कि अब क्या ??????????????? मम्मी शिवानी ठीक कहती थी हमने बेकार में ससे झगडा कर लिया ,अब पाखी और उनकी मम्मी दोनों को अफ़सोस है कि क्यों ये राज खुल गया ,और हमे भी एक ............
है कि क्यों पाखी बड़ी हो रही है ,पर यह तो जीवन चक्र है इसे कौन रोक पाया है
( आज के लिए इतना ही )

Thursday, November 26, 2009

पाखी और उनके band-aids

पाखी दरअसल घर में अकेली होने के कारण अपनी माँ का लाड प्यार कुछ ज्यादा ही पाती है ,अब इसे विवाद का विषय न बनाते हुए आगे चलते हैं कि क्या ज्यादा बच्चों को लाड -प्यार नही मिलता ,पाखी को एक बच्चे की आकृतिनुमा एक खिलौना बेहद पसंद था ,उसे हम सब फ्रेंड बुलाते थे ,पाखी के साथ साईकिल की सवारी करता ,पीठ पर चढ़ा रहता ,कुछ ऐसा लगता था कि पाखी को भावनात्मक लगाव उस निर्जीव से बढ़ता जा रहा था ,कहीं बाहर जाते हुए पूछने पर पाखी मैडम का प्यारा सा जवाब होता मम्मी band-aids लेती आना .पहले तो हैरत हुई की इतनी नन्ही सी बच्ची न किसी choclete की इच्छा न किसी खिलौने की फ़रमाइश ,बस कुछ band-aids .होता कुछ ऐसा था की गलती से भी फ्रेंड के कहीं चोट लगते ही तुरंत उसे band-aids की मरहम पट्टी होती ,हम सब उस नन्ही बच्ची में स्वयं जन्मी उस माँ को देखते रहते ,उसके उस जतन को देखते रहते ,समय गुजरता गया ,पाखी पढ़ाई के बढ़ते बोझ को अपने कन्धों पर उठाने की सफल कोशिश करने लगी है ,दुनिया को विस्तृत नजरिये से देखने लगी ,काफ़ी समझदार हो गई है .एक दिन घर की सफाई में वो friend हमारे हाथ में आ गया ,और वो सब बातें भी ,पाखी को कुछ बताने से पहले बोली मम्मी तुमने क्या -क्या कूड़ा जमा किया है ,फेको इसको .वो शायद इस आगे बढती हुई दुनिया के साथ कुछ तारतम्य बिठाने की कोशिश कर रही है और हम उन यादों को यहाँ महफूज करने की कोशिश कर रहें हैं .पाखी के पास आज भी band-aids होते हैं .पर किसी फ्रेंड के लिए नही ,सिर्फ़ अपने और अपनी मम्मी के लिए ही ।
पाखी अब बड़ी हो रही है ,और समझदार भी ,(आज के लिए बस इतना ही )

Monday, November 16, 2009

वो क्यों फोड़ते हैं बम? पाखी नहीं जानती

वो क्यों फोड़ते हैं बम? पाखी नहीं जानती
एक छोटी बच्ची ने
पूछाअपनी माँ से
ये आतंकवाद क्या है?
वो क्यों फोड़ते हैं बम?
क्यों मारते हैं?
मेरी सहेली और उसके पापा को
बेटी को समझा न सकी -
उसकी माँ कुछ भीक्योंकि
उस बालमन की दुनिया में
नही है नफरत, ईर्ष्या और द्वेष कोई
और न ही है कोई शब्दउसके
शब्दकोष मेंआतंकवाद जैसा कोई ..............................................

(यह भाव मन मेंउस समय आए जब दिल्ली में बम ब्लास्ट हो रहे थे और पाखी कुछ ऐसी ही मन: स्थिति से गुजर रही थी )

Friday, November 13, 2009

दिवाली की रात

दिवाली की रात

दिवाली की वो रात ,
पूरी रौशनी की वो रात ,
नए पकवानों की रात ,
आतिशबाजियों की वो रात ,
सारा उत्साह ,
सिर्फ़ मेरी पाखी के साथ ,
नित नई परिपक्व बातें करती ,
रंगोली बनाती ,
अचानक पूछ बैठती ,
माँ ,
लक्ष्मी जी के तो सिर्फ़ दो ही पैर हैं ,
वो कितनों के घर जायेंगी आज ????????

Tuesday, November 3, 2009

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए..........................

वो पंडित जी के आते ही सभी बच्चों का खेल रुक सा जाता था ,पंडित जी के थैले में एक बांसुरी और रंग -बिरंगी चित्र -कथाएं .खेल वहीँ का वहीँ रुक जाता जो चोर वो वहीँ वैसे ही ठहर जाता ,पंडित जी जैसे ही पीछे वाले ब्लाक में अखबार डालने जाते ,हम सब उनके थैले में से सारी किताबें गिन कर ईमानदारी से एक दूसरे को बाँट देते , और फिर शुरू हो जाता कॉमिक्स पढने का वो सिलसिला की शायद ,सबसे कम समय में सबसे ज्यादा पढने की रेस ,और सबके ऊपर बढती जाती हमारी खीज एक आधे लोगों से तो यह कहकर कॉमिक्स की जुगाड़ की जाती की तुम बहुत धीरे पढ़ते हो हमे दो हम तम्हें बाद में सारी कहानी सुना देंगे ,खींचतान चलती रहती ,सबसे ज्यादा पढने का और जल्दी पढने का हमारे साथ किसी का कोई मुकाबला तो था ही नही ,सो हम तो ठहरे अव्वल दर्जे के शैतान पर......... एक संजीदा लड़की चाहती थी कभी फुर्सत के लम्हों में पंडित जी से बांसुरी सुनना मगर वो हो न सका ,पूरी भीड़ जो चाहती थी ,हम भी उसी का नेतृत्व करते .दिन गुजरते रहे एक दिन पापा का ट्रान्सफर हम सब बोरिया बिस्तर बांधकर वापस लखनऊ और वो आज भी जेहन में है पंडित जी की बांसुरी जो कभी हम सुन न पाये ,काश कोई लौटा दे मेरे .........................................