वो क्यों फोड़ते हैं बम? पाखी नहीं जानती
एक छोटी बच्ची ने
पूछाअपनी माँ से
ये आतंकवाद क्या है?
वो क्यों फोड़ते हैं बम?
क्यों मारते हैं?
मेरी सहेली और उसके पापा को
बेटी को समझा न सकी -
उसकी माँ कुछ भीक्योंकि
उस बालमन की दुनिया में
नही है नफरत, ईर्ष्या और द्वेष कोई
और न ही है कोई शब्दउसके
शब्दकोष मेंआतंकवाद जैसा कोई ..............................................
(यह भाव मन मेंउस समय आए जब दिल्ली में बम ब्लास्ट हो रहे थे और पाखी कुछ ऐसी ही मन: स्थिति से गुजर रही थी )
हमारी बेटी पाखी को समर्पित कुछ हमारी भावनाएं कुछ उसकी महात्वाकान्क्षाएँ, जिन्दगी को भरपूर जीने की कोशिश देखें की आगे आगे होता है क्या
Monday, November 16, 2009
Friday, November 13, 2009
दिवाली की रात
दिवाली की रात
दिवाली की वो रात ,
पूरी रौशनी की वो रात ,
नए पकवानों की रात ,
आतिशबाजियों की वो रात ,
सारा उत्साह ,
सिर्फ़ मेरी पाखी के साथ ,
नित नई परिपक्व बातें करती ,
रंगोली बनाती ,
अचानक पूछ बैठती ,
माँ ,
लक्ष्मी जी के तो सिर्फ़ दो ही पैर हैं ,
वो कितनों के घर जायेंगी आज ????????
दिवाली की वो रात ,
पूरी रौशनी की वो रात ,
नए पकवानों की रात ,
आतिशबाजियों की वो रात ,
सारा उत्साह ,
सिर्फ़ मेरी पाखी के साथ ,
नित नई परिपक्व बातें करती ,
रंगोली बनाती ,
अचानक पूछ बैठती ,
माँ ,
लक्ष्मी जी के तो सिर्फ़ दो ही पैर हैं ,
वो कितनों के घर जायेंगी आज ????????
Tuesday, November 3, 2009
कोई लौटा दे मेरे बीते हुए..........................
वो पंडित जी के आते ही सभी बच्चों का खेल रुक सा जाता था ,पंडित जी के थैले में एक बांसुरी और रंग -बिरंगी चित्र -कथाएं .खेल वहीँ का वहीँ रुक जाता जो चोर वो वहीँ वैसे ही ठहर जाता ,पंडित जी जैसे ही पीछे वाले ब्लाक में अखबार डालने जाते ,हम सब उनके थैले में से सारी किताबें गिन कर ईमानदारी से एक दूसरे को बाँट देते , और फिर शुरू हो जाता कॉमिक्स पढने का वो सिलसिला की शायद ,सबसे कम समय में सबसे ज्यादा पढने की रेस ,और सबके ऊपर बढती जाती हमारी खीज एक आधे लोगों से तो यह कहकर कॉमिक्स की जुगाड़ की जाती की तुम बहुत धीरे पढ़ते हो हमे दो हम तम्हें बाद में सारी कहानी सुना देंगे ,खींचतान चलती रहती ,सबसे ज्यादा पढने का और जल्दी पढने का हमारे साथ किसी का कोई मुकाबला तो था ही नही ,सो हम तो ठहरे अव्वल दर्जे के शैतान पर......... एक संजीदा लड़की चाहती थी कभी फुर्सत के लम्हों में पंडित जी से बांसुरी सुनना मगर वो हो न सका ,पूरी भीड़ जो चाहती थी ,हम भी उसी का नेतृत्व करते .दिन गुजरते रहे एक दिन पापा का ट्रान्सफर हम सब बोरिया बिस्तर बांधकर वापस लखनऊ और वो आज भी जेहन में है पंडित जी की बांसुरी जो कभी हम सुन न पाये ,काश कोई लौटा दे मेरे .........................................
Sunday, October 25, 2009
साफ सुथरी जिन्दगी की सड़क हो जो
जब बेटी माँ से अपना कद नापे ,
क्यों न वो शाख सी ख़ुद झुक जाए ,
कैसे बढे हौसला बेटी का
कैसे टूटे तारा किसी निराशा का
माँ तो माँ है माँ ही जाने
क़दम -क़दम पर हाथ बढाए
जब बेटी को चोट जो आए ,
माँ ही मन पे जख्म वो पाये
माँ तो माँ है माँ ही जाने
कैसे दिखाए उसे वो रास्ता ,
जो कोई दलदल न हो ,
होता हो गर तो ,
जिन्दगी की एक साफ सुथरी सड़क होती हो!!!!!!!!!!!!!!
क्यों न वो शाख सी ख़ुद झुक जाए ,
कैसे बढे हौसला बेटी का
कैसे टूटे तारा किसी निराशा का
माँ तो माँ है माँ ही जाने
क़दम -क़दम पर हाथ बढाए
जब बेटी को चोट जो आए ,
माँ ही मन पे जख्म वो पाये
माँ तो माँ है माँ ही जाने
कैसे दिखाए उसे वो रास्ता ,
जो कोई दलदल न हो ,
होता हो गर तो ,
जिन्दगी की एक साफ सुथरी सड़क होती हो!!!!!!!!!!!!!!
पाखी वो देखो दूल्हा
बात उन दिनों की है ,पाखी ने कुछ अपने आस -पास की चीजों को जानना और समझना शुरू ही किया था ,नए -नए शब्दों से परिचित हो रही थी .पाखीहमारे साथ एक शादी में जा रही थी ,परिवार के मित्रों के कुछ बच्चे भी हमारे साथ थे .पाखी बहुत खुश थी ,उन बच्चों के साथ और हम खुश थे कि वो खुश है ,रास्ते में एक बारात जा रही थी,शादियों के मौसम में सड़कों से बारात का गुजरना मतलब सड़क थोडी देर के लिए अपनी ही मिलकियत मान लिया जाना होता है .दूल्हा सजा सवांरा ,(सजाते तो बकरों को भी बलि देने से पहले हैं )देखते ही उनमे से एक बच्चा
उत्साह से जोर से चीखा ,पाखी वो देखो दूल्हा ,पाखी को शायद इस तरह से सड़क पर हंगामा पहली बार देखने को मिल रहा था ,दोस्तों के साथ में होने से उनका उत्साह भी देखता ही बनता था .पाखी बड़े कौतुहल से उस जंतु को छोड़कर जो घोडे पे बैठा था ,सिर्फ़ घोडे को ही देखती रही ,पाखी कि निगाहें घोडे पर और हमारी सिर्फ और सिर्फ पाखी पर .बारात पीछे रह गई हम लोग आगे निकल गए .मेरी जिज्ञासा बेचैन थी कि कहीं पाखी ने आज एक ग़लत शब्द तो नही सीख लिया ,हमने अपनी बिटिया रानी से पूछा ,बेटा आपने दूल्हा देख लिया ?पाखी ने सहमति में सर हिलाते हुए कहा कि हाँ ,हमने पूछा तो फिर किसे कहते हैं दूल्हा ,जरा हमे तो बताओ ।
पाखी ने बड़ी मासूमियत से कहा horse को कहते है न मम्मी दूल्हा !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
उत्साह से जोर से चीखा ,पाखी वो देखो दूल्हा ,पाखी को शायद इस तरह से सड़क पर हंगामा पहली बार देखने को मिल रहा था ,दोस्तों के साथ में होने से उनका उत्साह भी देखता ही बनता था .पाखी बड़े कौतुहल से उस जंतु को छोड़कर जो घोडे पे बैठा था ,सिर्फ़ घोडे को ही देखती रही ,पाखी कि निगाहें घोडे पर और हमारी सिर्फ और सिर्फ पाखी पर .बारात पीछे रह गई हम लोग आगे निकल गए .मेरी जिज्ञासा बेचैन थी कि कहीं पाखी ने आज एक ग़लत शब्द तो नही सीख लिया ,हमने अपनी बिटिया रानी से पूछा ,बेटा आपने दूल्हा देख लिया ?पाखी ने सहमति में सर हिलाते हुए कहा कि हाँ ,हमने पूछा तो फिर किसे कहते हैं दूल्हा ,जरा हमे तो बताओ ।
पाखी ने बड़ी मासूमियत से कहा horse को कहते है न मम्मी दूल्हा !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
Monday, January 12, 2009
मेरे ब-गैर
बालिका वधू देखती ,
अन्याय के प्रति जागरूक होती ,
नित नए प्रश्न पूछती,
अवाक ,हैरान ,ठगी सी खड़ी मै
देखती उसे प्रति पल बड़ी होते ,
मेरी हर इच्छा का ध्यान रखते हुए ,
अपनी बातों को मानने को बाध्य करती ,
अपनी राह को प्रशस्त करती हुई ,भी
अभी इतनी बड़ी तो नही हुई है वो
जो देख पाये ,अपने आपको ,
मेरे ब-गैर ,मेरी छाया के ब-गैर
अन्याय के प्रति जागरूक होती ,
नित नए प्रश्न पूछती,
अवाक ,हैरान ,ठगी सी खड़ी मै
देखती उसे प्रति पल बड़ी होते ,
मेरी हर इच्छा का ध्यान रखते हुए ,
अपनी बातों को मानने को बाध्य करती ,
अपनी राह को प्रशस्त करती हुई ,भी
अभी इतनी बड़ी तो नही हुई है वो
जो देख पाये ,अपने आपको ,
मेरे ब-गैर ,मेरी छाया के ब-गैर
Monday, December 1, 2008
बेटी
समझदार होती बेटी ,
कुछ इस तरह होती है ,
जैसे बारिश के बादका इन्द्रधनुष
काली घटा की घनघोर बारिश के बाद ,
हरी, धुली , स्वच्छ और मौन प्रकृति
बेटी का बड़ा होना ,उसका गुनगुनाना
माँ की जानबूझ कर की गई गलतियों पर ,
उसका झुन्झुन्लाना ,उसका रूठ जाना,
बहुत कुछ शामिल है अब उसके साथ ,
जिसे भेजा है ,खुदा ने मेरे पास ,
मेरी बेटी की शक्ल में ,
वो है एक समझदार बेटी ,
होनहार बेटी
कुछ इस तरह होती है ,
जैसे बारिश के बादका इन्द्रधनुष
काली घटा की घनघोर बारिश के बाद ,
हरी, धुली , स्वच्छ और मौन प्रकृति
बेटी का बड़ा होना ,उसका गुनगुनाना
माँ की जानबूझ कर की गई गलतियों पर ,
उसका झुन्झुन्लाना ,उसका रूठ जाना,
बहुत कुछ शामिल है अब उसके साथ ,
जिसे भेजा है ,खुदा ने मेरे पास ,
मेरी बेटी की शक्ल में ,
वो है एक समझदार बेटी ,
होनहार बेटी
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